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You searched for: subject:"alochana"
[texts]भारतीयता का सार - प्रफुल्ल कोलख्यान
उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण के इस दौर में भीतरी और बाहरी, अपने और पराये, स्थानिक और वैश्विक, तात्कलिक और शाश्वत, शक्ति और शील, सौंदर्य और शिव, नूतन और पुरातन के बीच के द्वंद्व, तनाव और संतुलन बि...
Keywords: kolkhyan; Hindi; Bhartiyta; Alochana
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[texts]अस्मिता क्या और क्यों - प्रफुल्ल कोलख्यान
नव-सामाजिक आंदोलनों की खासियत यह है कि ये अस्मिता के सवाल को तो उठाते हैं, लेकिन उसके वर्गीय आधार को नकारते  हैं। बल्कि ये अपने को सामाजिक दायरे के नाम पर आर्थिक और राजनीतिक प्रसंग को अपने लिए ...
Keywords: कोलख्यान; अस्मिता; हिंदी; kolkhyan; alochana
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[texts]रवींद्रनाथ ठाकुर को याद करने का मतलब - प्रफुल्ल कोलख्यान (Prafulla kolkhyan)
विश्व संस्कृति की एकत्व चेतना, भक्ति साहित्य की सामाजिक चेतना और आधुनिक समय की राजनीतिक चेतना के समन्वित तत्त्व से रवींद्रनाथ ठाकुर के अद्भुत व्यक्तित्व का गठन हुआ। रवींद्रनाथ के साहित्य म...
Keywords: कोलख्यान,kolkhyan; ravindranath; bangla; alochana
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[texts]आलोचना की संस्कृति - प्रफुल्ल कोलख्यान
जीवन-विवेक न उभय-निष्क्रियता की बात करता है और न निष्पक्षता का। ऐसा इसलिए कि विषम समाज अपनी निर्मिति में ही पक्षपातपूर्ण होता है। पक्षपातपूर्ण वातावरण में, निष्पक्षता चालू पक्षपातपूर्ण व्य...
Keywords: कोलख्यान; आलोचना; संस्कृति; kolkhyan; alochana; hindi
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[texts]आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का आलोचना विवेक और इतिहास के सवाल - प्रफुल्ल कोलख्यान
हिंदी साहित्य का इतिहास और आलोचना प्रारंभ से ही धर्म और भक्ति के अंतर को नजरअंदाज करती आई है एवं दोनों को एक दूसरे का पर्याय मानकर विवेचन करती आई है। इस आधार पर होनेवाले विवेचन में स्वाभाविक र...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; आलोचना; हजारीप्रसाद; kolkhyan; hindi; Alochana
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[texts]यशपाल साहित्यः नैतिकता की सामाजिक तलाश - प्रफुल्ल कोलख्यान
महत्त्वपूर्ण साहित्य पाठक-दर-पाठक तो गतिमान बना ही रहता है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी भी गतिमान बना रहता है। कहना न होगा कि प्रत्येक पीढ़ी साहित्य को नये सिरे से पढ़ती है। ऐसा करते हुए प्रत्येक पीढ़ी अपन...
Keywords: कोलख्यान; यशपाल; नैतिकता; समाज; kolkhyan; alochana; आलोचना
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[texts]नामवर सिंहः सहज दृष्टि की जटिल वाग्मिता - प्रफुल्ल कोलख्यान
जीवन में रोटी बहुत जमीन घेरती है। रोटी खाने के बाद भी कुछ जमीन बची रहती है। इसी बची हुई जमीन पर सपनों का नाच होता है। अधिकतर लोग रोटी के साथ जमीन भी खाते हुए चलते हैं, और सपने ! सपनों का नाच खत्म हो...
Keywords: कोलख्यान; नामवर; आलोचना; kolkhyan; namvar; alochana; hindi
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[texts]बाकलम खुद कुमारिल खुद प्रभाकर हिंदी के नामवर - प्रफुल्ल कोलख्यान
वस्तुत: आलोचना का काम साहित्य और संस्कृति में सक्रिय अंधबिंदुओं की पहचान और साहित्य और संस्कृति के उपादानों के सहारे ही अंधबिंदुओं को निष्क्रिय कर दृष्टिबिंदुओं को सक्रिय बनाने का है। बहैस...
Keywords: कोलख्यान; नामवर; आलोचना; kolkhyan; namvar; alochana; hindi
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[texts]स्त्री-विमर्शः विवेक को प्राण-प्राण पुकारती पुस्तक - प्रफुल्ल कोलख्यान
सब कुछ के बावजूद जितनी शीघ्रता से अपने चेहरे से झुर्रियों को उतार सकती हैं औरतें, उतार सकती हैं पूरी सभ्यता की सदियों की थकान वह किसी के भी मन में भरोसा और विश्वास पैदा कर सकता है। इसी भरोसे और ...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; आलोचना; स्त्री-विमर्श; kolkhyan; hindi; alochana
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[texts]जल कर जो रौशन करे जिंदगी को, जहान को - प्रफुल्ल कोलख्यान
इस गुत्थी को समझना दिलचस्प हो सकता है कि क्यों प्रेमचंद न तो ब्राह्मणवादियों को स्वीकार्य होते हैं और न ही ब्राह्मणवाद के तथाकथित विरोधियों को ही स्वीकार्य हो पाते हैं। जरा ठहरकर गहराई से वि...
Keywords: कोलख्यान,हिंदी,kolhyan,hindi; premchand; dalit; alochana; hindi
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[texts]सामाजिक समस्याएँ, इतिहास विवेक और आलोचना के सवाल - प्रफुल्ल कोलख्यान
मेरे पाँच लेख एक साथ प्रस्तुत हैं। ये विभिन्न अवसर पर लिखे गये हैं। इनकी विषय वस्तु में अंतस्संबंध के कारण इनमें कई जगह दुहराव भी मिल सकते हैं। मैं अध्यापन के कार्य से जुड़ा हुआ नहीं हूँ और अप...
Keywords: कोलख्यान; हजारीप्रसाद; दलित; कबीरआलोचना; समाज; हिंदी; kolkhyan; hazariprasad.hajariprasad; alochana; kabir; dalit
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[texts]Alochana January-March 1967 - Professor Pritam Singh
This is the January-March 1967 issue of Alochana magazine which was edited by Professor Pritam Singh.
Keywords: January-March 1967; Alochana magazine; Professor Pritam Singh; Professor Sahib Singh; Sikh; Sikhi; Sikhism; Punjab; Punjabi; manuscript; conservation
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